(6) मैं तो नाचूंगी गूलर तले!








हमारे बचपन से आज तक बारिश में शहर की सड़कें नाले का काम करती आ रही हैं। अब जब हम 'विकास की राह' पर अग्रसर हैं तो  नाले भी  सड़कों का काम करने लगे हैं। ये 'सड़कें' भू-माफिया, नेता और रसूखदारों द्वारा कब्जा ली जाती हैं। ऐसी 'सड़कें' या 'प्राइवेट' नाले अब कई दुकानों के Foyer या बरामदा और बंगलों के Backyard होते हैं। 

हमारे एरिया के पास के कब्जाए नाले के किनारे किस्मत से कुछ पेड़ 'विकास की पैनी नज़र' से छूट गए हैं। और उनमें से एक पेड़ गूलर का भी है। इस पेड़ पर कुछ चिड़ियों, कीट पतंगों और हमारा ही आना जाना होता है। 

इस पेड़ के लिए हमसे किसी मनुष्य की कोई प्रतियोगिता या होड़ नहीं है। यहां के पढ़े-लिखे धनाढ्य विद्वान  गुलाब-जामुन और गुलगुले खाएंगे; गूलर तो खाने से रहे। इस दौर के बच्चे भी पके गूलर नहीं खाते हैं। सब अपना ही माल है। बस यहीं से साल में एक दो बार गूलर तोड़ लेते हैं और हमारी  'तवाभाजी' हो जाती है।

गूलर (Ficus racemosa) फाईकस  (Ficus) कुल (Family) का एक विशाल वृक्ष है। इसे संस्कृत में उडूंबर, ऊंबर,  छत्तीसगढ़ में डूमर, बांग्ला में डुमुर, मराठी में औदुंबर और गुजराती में उम्बरा कहते हैं। इसके तने और शाखाओं  से भर भर के फल निकलते हैं। इसे अंग्रेजी में Cluster Fig  कहा जाता है।

इसके फल गोल-गोल अंजीर ( Ficus  Carica) की तरह होते हैं। लेकिन गूलर गुच्छों में उगते हैं। कटहल के समान गूलर भी अपने फल देने के लिए इतना ज्यादा लालायित होता है कि जहां-तहां से कल्ला (अंकुर) फाड़ कर फूट पड़ता है। 


गूलर का पका फल ( लाल या नारंगी रंग का) हल्का मीठा होता है। इसके कच्चे फल ( हरे रंग) की सब्ज़ी भी बनाई जाती है। 

चौड़े-चौड़े हरे-हरे पत्ते होते हैं गूलर के। प्यारी-प्यारी कोंपलें निकलती हैं। न जाने कितने जानवर, पक्षी और जीव-जंतु इन फलों और पेड़ों पर पनपते हैं। उनकी पूरी दुनिया ही इस पेड़ के इर्द-गिर्द घूमती है। जैसे उस कीट की जो गूलर के फल में ही छेद करके अपने अंडे देता है और बच्चे उसी में पलने-पुसने के बाद खुद ही बाहर निकल आते हैं। इसी कारण पके गूलर को ध्यान से खोलना और खाना चाहिए। कच्चे गूलर में कीड़े की कोई समस्या नहीं होती है।

इसकी पत्तियों से सफेद-सफेद 'दूध'( Latex) निकलता है। ज्यादा मत उछलो! इसकी चाय नहीं बनती है! ऐसे पेड़-पौधे चोट लगने पर सुरक्षात्मक गाढ़ा तरल 'दूध' छोड़ते हैं। किसी-किसी पेड़ या पौधे का ऐसा दूध जहरीला भी हो सकता है।

गूलर में विटामिन B2, आयरन, कॉपर, पोटेशियम, कैल्शियम जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। माना जाता है कि गूलर  कब्ज, डायबिटीज, खून की कमी, घाव भरने और सूजन जैसी समस्याओं में लाभकारी है। इसके फल, पत्ते और छाल का काढ़ा बनाकर भी प्रयोग किया जाता है। 

सभी जानते हैं कि गूलर के फल के अंदर कीड़े होते हैं। तुलसीदास ने रामचरितमानस में लिखा भी है: गूलरि फल समान तव लंका

(रामचरितमानस के लंकाकांड में अंगद-रावण संवाद की  ये एक प्रसिद्ध चौपाई का अंश है, जिसमें अंगद रावण से कहते हैं कि तुम्हारी लंका गूलर के फल जैसी तुच्छ है और राक्षस उसके भीतर कीड़ों की तरह अज्ञानी बनकर रह रहे हैं, जो तुम्हारे साथ शीघ्र ही  नष्ट हो जाएंगे।) 

कुछ कांवड़ यात्रियों में ये मान्यता है कि गूलर के पेड़ के नीचे से कांवड़ ले जाना अशुभ होता है। अशुभ समझ कर कई बार कांवड़ के रास्ते के गूलर के पेड़ काट दिये जाते हैं! बताइए!!

भले ही गूलर के फल की तुलना रावण की लंका से की गई हो, हिंदू धर्म में गूलर ( Ficus  recemosa) के पेड़ को बरगद ( Ficus benghalensis) और  पीपल ( Ficus religiosa) के समान ही पवित्र  माना जाता है और भगवान कृष्ण व शिव से जोड़ा भी जाता है। इस के नीचे पूजा-पाठ भी किया जाता है।  

छत्तीसगढ़ और समीपवर्ती राज्यों के भागों में यही गूलर विवाह की रस्मों का  गवाह बनता है। गूलर के पेड़ की लकड़ी और पत्तियों से विवाह का मंडप बनता है, इसकी लकड़ी से बने पटिए पर बैठकर वर-वधू वैवाहिक रस्में पूरी करते हैं।

वेब साइटें बता रही हैं कि देश के कई हिस्सों में टोने-टोटके में गूलर का इस्तेमाल किया जाता है। गूलर की जड़ की ताबीज़ पहनने से अपार धन की प्राप्ति होने का दावा भी कई जगह दिखाई देता है। जीवन के आखरी पड़ाव में आप भी ऐसे तावीज पहन सकते हैं, चाहें तो। लेकिन  'वो' न  तो आपसे फंसने वाली है और न ही आप को दौलत, शोहरत और  जवानी वाली सेहत अब दोबारा मिलने वाली है। बेहतर होगा मरने से पहले एक बार तावीज को भूलकर गूलर की सब्जी ही खा लें, भले ही पके गूलर न खाएं! अच्छा लगेगा!

सुनते थे कि इसे खाने से आंखों की रोशनी बहुत तेज रहती है। तो बचपन में गूलर खूब खाया। अभी भी कभी-कभी खा लेते हैं, कभी दूर से कुछ अच्छा दिख ही जाए! लेकिन चश्मा फिर भी लगा, मोतियाबिंद के ऑपरेशन भी हुए। मन की आंखों से ही ज्यादा अच्छा दिखाई देता है। कम्मो भी!

ऐसा भी कहा जाता है कि एक बार 'गूलर का फूल' देख लो तो सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं। इच्छाएं तो लगभग सभी पूरी हो गई हैं लेकिन 'गूलर का फूल' कभी नहीं दिखा! कारण बाद में मालूम हुआ कि गूलर का फूल गूलर के अंदर होता है। मन की प्रसन्नता भी अंदर की बात है और हम बाहर ढूंढते रहते हैं! मिलेगी कैसे!?

( 'गूलर का फूल होना' एक पुराना मुहावरा है जिसका अर्थ है: दुर्लभ होना या मुश्किल से दिखाई देना।)

लोक मान्यता है कि इसकी लकड़ी पानी में सड़ती नहीं, इसलिए कुएँ और बावड़ी में नींव के लिए इस्तेमाल होती है।  हमारा विचार है कि पड़ी लकड़ी और उड़ते तीरों से दूरी बनाकर रखें। बाकी आपकी इच्छा। हमारी सलाह तो मानोगे नहीं!

गूलर एक प्राचीन सूफी परंपरा से भी जुड़ा है। उत्तराखंड के रुड़की के पास स्थित पीरान कलियर दरगाह में 'गूलर' हजरत साबिर पाक की इबादत से सदियों से जुड़ा है और यहां ढेरों मन्नतें मांगी जाती हैं।

( तेरहवीं सदी के मखदूम अलाउद्दीन अली अहमद साबिर जिन्हें साबरी पिया या साबिर पाक के नाम से भी जाना जाता है;
उस समय के एक प्रमुख चिश्ती सूफी संत थे। उनकी दरगाह  पीरान कलियर  में गंगा नहर के किनारे स्थित है। यह स्थान हिंदू-मुस्लिम एकता और आस्था का प्रतीक है, जहाँ हर साल उर्स मनाया जाता है। अगला यानी 758 वाँ उर्स सितंबर 2026 में मनाया जाएगा।)

कभी सालाना उर्स के समय वहां जाकर अद्भुत माहौल देखें। एक अलग ही अनुभव प्राप्त होगा।

पीरान कलियर में ये कव्वाली 'नाचूंगी गुलर तले' अलग-अलग रूप में  गाई जाती है। समझने के लिए पहले ये एक-एक मिनट वाले दो वीडियो क्लिप देख लीजिए:

(2) तेरी अदाओं पे दिलबर निसार हो जाए। ( बिल्कुल ऐसे ही नाचना है भिया, गूलर तले।)

अब ये सब अच्छा लगा हो तो चार मिनट वाला ये वीडियो भी देख लीजिए। इसे दो बच्चों ने बहुत ही उत्साह से गाया है: कलियर शरीफ: मैं तो नाचूंगी गुलर तले

पूरी कव्वाली 15 मिनट से भी अधिक लंबी है। अगर टाइम है तो अपने-अपने चश्मों से जरूर सुनें और देखें: कलियर के राजा का भी किरपा नजरिया। साजन बाबू की गाई इस कव्वाली में राम भगवान, श्रृंगार और हिंदी रीति रिवाजों के बारे में भी बहुत कुछ है।

हमारी भी एक प्रबल और उद्दंड इच्छा है कि हम भी कभी 'किसी' को गुलर तले नाचते-गाते देखें। इन्ने तो साफ मना कर दिया है! देखते हैं, और कोई कभी मिल ही जाए नाचते गाते गूलर तले!


( हमें तो ऐसी ही पुरानी चीजें अच्छी लगती हैं। पुरानी चीज मतलब ग्रामोफोन हेगा, डामिस!)

यार एक बात समझ नहीं आई। ये कव्वाली "मैं नाचूंगी गूलर तले" किसी गीत या कव्वाली के रूप में कभी हिंदी फिल्म उद्योग तक कैसे नहीं पहुंच पाई? (या हो सकता है पहुंची भी हो और हमें इल्म न हो।)

संक्षेप में, गूलर का पेड़ सिर्फ एक वृक्ष नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, साहित्य और परंपराओं का एक अभिन्न अंग है, जो प्रकृति, आध्यात्मिकता और लोक-जीवन की त्रिवेणी है।

लोक साहित्य में इसे एक ऐसे वृक्ष के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है, जो न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि ग्रामीण संस्कृति का अभिन्न अंग भी है। हो भी क्यों नहीं; गूलर पोषण, औषधीय गुणों और ठंडी छाया से भरपूर होते हैं। 

(साइकिल चलाने के बाद किसी गांव के घने गुलर की छाया में सुस्ताने के लिए  बैठते ही शर्मा बंधुओं का गाया ये भजन दिमाग में अपने आप बजने लगता है: जैसे सूरज की गर्मी से तपते हुए तन को मिल जाए तरुवर की छाया। हमारे लिए तरुवर मतलब: बरगद, पीपल, गूलर, पाकड़, आम,  इमली, नीम आदि  के विशाल वृक्ष।)

चलते चलते अमीर खुसरो का गूलर पर लिखा एक 'ढकोसला'  समझ लेते हैं।

ढकोसलों का प्रचलित अर्थ है आडम्बर, पाखंड या ऊपरी ठाट-बाट। लेकिन लोक साहित्य में 'ढकोसले' का मतलब कुछ और भी है:  एक विशेष प्रकार की कविता, उक्ति, या दोहा, जिसका अर्थ न हो और जो इतनी बेतुकी हो कि सुन कर एकदम हँसी आ जाए। खुसरो ने आम लोगों का मन बहलाने व हँसाने के उद्देश्य से ये 'ढकोसले' लिखे थे। ढकोसले रईसों के महीनों चलने वाले विवाह समारोह के हों या अमीर खुसरो के; इन्हें देख या पढ़कर हंसी तो आती ही है!

अमीर खुसरो के 'ढकोसले' हिन्दी साहित्य की एक अनोखी विधा है, जो सतही तौर पर बेतुकी लगने वाली पंक्तियों के माध्यम से गहरी आध्यात्मिक और दार्शनिक बातें कहती हैं। ये आडम्बर और पाखंड पर व्यंग्य करते हैं और सुनने वाले की समझ पर निर्भर करता है कि वह इसका गहरा अर्थ समझ सके। उदाहरण के लिए उनका गुलर पर लिखा एक 'ढकोसला' नीचे प्रेषित है:

भैंस चढ़ी बिटोरी और लप लप गूलर खाए।
उतर आ मेरे साँड की, कहीं हिफ्ज न फट जाए।




(ग्रामीण भारत में गोबर के उपलों (कण्डों) को जमा करके बनाया गया एक शंकु  (Cone) के आकार का ढेर  बिटोरा या  बिटोरी कहलाता है।)

लगता है कि इन गूलर देवी और भैंस की  अदला बदली कर दें तो ज्यादा मजा आएगा! खुसरो भी खुस हो जाएंगे! शायद, खुस हो के रो भी दें हमारी बेतुकी बातों और फोटो  पर!

और शायद ऊपर से आशीर्वचन भी दे दें: "लिखते तो बहुत भद्दा हो, बेटे। पर हमें याद तो किया! खुस रो बेटे पंकज, खुस रो!!"

शाम ढलने के पहले हमारी 'जानेमन'  हिसाब से गुलर तोड़ लेंगी आपके और हमारे लिए। और अगले ब्लॉग पोस्ट में नाचते-नाचते, गाते-गाते बना भी लेंगे नाना प्रकार के गुलर के व्यंजन इनके साथ। बाउजी फोटो में इसलिए नहीं दिख रहे हैं क्योंकि वो महुए  की दारू की जुगाड़ में भटक रहे हैं गांव में! बगैर 'महुए' के गूलर!? चांस ही नहीं है!

भुक्कड़ भैंसे-भैंसियों;  बस अगले ब्लॉग पोस्ट तक तो रुक जाओ! साथ में मिलकर सेवन करेंगे और लप लप खाएंगे गूलर!

फिर बहुत जोर गाएंगे भी और नाचेंगे भी गूलर तले: मैं तो नाचूंगी गूलर तले। मैं तो नाचूंगी गूलर तले।


पंकज खन्ना 
9424810575

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हिन्दी में:

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Love Thy Squares: Magic Squares के बारे में।
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