(5) कनकौए का साग और बाजरे की रोटी!
आज आपके भियाओ बनाने वाले हैं कनकौआ का साग। बाजरे की रोटी बनाने का हक तो सिर्फ श्रीमतीजी ही रखती हैं। आगे बताएंगे ऐसा क्यों। सबसे पहले कनकौआ की फोटो देख लीजिए।
(ये पत्तियां आपके चेहरे का तेज देखकर नहीं चमक रही हैं। फोटो बारिश में ली गई है, बुद्धू! बताना ये था कि देखो कैसे पथरीली जमीन में से भी कनकौआ उग जाता है आराम से।)
कनकौआ के अन्य नाम हैं: Commelina benghalensis, Benghal dayflower, Tropical Spiderwort, Wandering Jew, कनशीरा, कांचरा आदि।
कनकौए में विटामिन B2, B3, और C पाए जाते हैं। इसके अलावा कनकौए में कॉपर, आयरन, फास्फोरस,पोटैशियम,सोडियम और जिंक जैसे मिनरल भी काफी मात्रा में पाए जाते हैं।
कनकौए के फ़ूल नीले या बैंगनी रंग के होते हैं और बहुत सुंदर होते हैं।
ऊपर वाली पहली फोटो देखी-देखी लग रही है ना!? गांव, शहर, जंगल मतलब कहीं पर भी ये सब्जी उगी दिख जाएगी। सब्जी मंडी में जाओगे तो कहीं बिकती नहीं मिलेगी। लेकिन मंडी के आसपास की खाली जमीन पर भी बहुत सारी उगी हुई दिख जाएगी! ना कोई तोड़ेगा, न कोई बेचेगा! और ना ही कोई खरीदेगा!
तो क्या करें!?
बड़ा आसान तरीका है। जहां दिखे वहीं तोड़ लें। शरम आ रही है? हिम्मत नहीं हो रही है? आप तो कभी पारसी मोहल्ले में रहे ही नहीं! शर्म तो आएगी ही, डर भी लगेगा!
दूसरा तरीका ये है कि किसी देसी फूड ब्लॉगर को पकड़ो। घर बुलाओ! खिलाओ, पिलाओ, दोस्ती बढ़ाओ! एक को तो आप अच्छे से पहचानते हो! बुलावा भेज दो, शायद वो ही तोड़ कर ले आएगा!
इसका स्वाद कैसा होता है? ऐसा समझ लीजिए कि जैसे एक किलो पालक में 100-150 ग्राम सरसों मिला दी गई हो।
अब कनकौए की साग बनाने की विधि देख लेते हैं:
चूल्हा जलाओ। तवा गरम करो। रिश्ते भी, खून भी। तेल या घी डालो, कटे प्याज डालो। प्याज हिलाते-हिलाते अब गहन सोच में डूब जाओ और जोर-जोर से बोलो:
पाक कला को बदल डालूंगा! रेसिपियों को लिखने की स्टाइल बदल डालूंगा! देसी वन्य भाजियों के बारे में सोच बदलवा दूंगा! देश और समाज को बदल डालूंगा! जुल्म को जला के राख कर दूंगा...!
ऐसे जोर-जोर से चिल्लाने से कुछ बदलने वाला नहीं है। लेकिन फील अच्छा आएगा और लगे हाथ प्याज भी भुन जाएंगे! अपने सुनहरे अतीत के दिन याद करें। बस इतने ही सुनहरे प्याज भी भूनने हैं!
लेकिन भविष्य तो आपका अंधकार में है, बिल्कुल काला है। कम से कम प्याज तो काले मत करो भिया!
हम जानते हैं कि आप अदरक का स्वाद नहीं जानते हैं। फिर भी अदरक के बारीक टुकड़े भुने प्याज में जरूर डालें। क्योंकि कुछ इंसान भी आ सकते हैं आपके घर खाने के लिए! थोड़ी देर अदरक प्याज को हल्की आंच पर लगातार हिलाते रहें।
अब थोड़ा लस्सन डालें। लहसुन डालते ही खुशबू का पहला गुबार उठेगा। थोड़ा जल्दी-जल्दी प्याज, अदरक और लस्सन को पलटे से हिलाएं-डुलाएं। थोड़ी देर में दूसरा गुबार उठेगा। अब फट से कटे हुए कनकौए डाल दें।
ऐसा न हो कि कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे!
तीन चार मिर्ची डाल दें। कनकौए को भी मिर्ची लगती है!
थोड़ी देर के लिए सब्जी को धीरे से और स्नेह से ढंक दें। कनकौए के कटे पत्ते सारे फ्लेवर्स को आत्मसात कर लेंगे। बीच-बीच में सब्जी को हिलाते रहें।
रिटायर होने के पहले तो आप सब जगह जाकर हर चीज का निरीक्षण कर लेते थे, खुद की तोंद छोड़कर! आज आराम से अपनी तोंद को अच्छे से देखें, सूक्ष्म निरीक्षण करें और फिर हिसाब लगाएं: तेल/घी डालना है या पानी! शर्म से पानी-पानी हो गए? तो थोड़ा सा पानी ही डाल दीजिए! अब फिर से सब्जी को पलटे से हिला दें।
याद रहे आप जुल्म को जलाकर राख करना चाहते हैं, कनकौए के साग को नहीं। इसे पलटे से हिलाते रहें!
अंत में आपकी इच्छा से नमक और अन्य मसाले डाल दीजिए। वैसे मसाले कम ही रखना। लेखनी में ही मसालों की जरूरत ज्यादा होती है;)
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तवा कसम, रोटी हो तो बाजरे की!
(हिंदी में बाजरा। अंग्रेजी में Pearl Millet. Scientific Name: Pennisetum glaucum.)
पहले बाजरे की महिमा समझ लें। बाजरा सिर्फ अनाज नहीं है, ये एक भावनात्मक प्रतीक भी है: आत्मनिर्भरता, गाँव की सादगी, और दादी मां/नानी मां/माँ/ बीबी/बहन/भोजाई के हाथों की रोटियों का।
किसी भी अनाज या मोटे अनाज ( Grains or Millets) पर इतने लोकगीत या अन्य गीत नहीं बने हैं जितने बाजरे पर बने है। बाजरे पर असंख्य बालगीत भी बने हैं जिन्हें आप आसानी से यू ट्यूब पर देख सकते हैं। हमारी पसंद का बाजरा गीत/बाल गीत/पिकनिक गीत ये है:
हमने हिंदी माध्यम स्कूल में बचपन में ये गीत बहुत गाया है। सारे शब्द तो याद नहीं हैं पर ऐसा ही कुछ गाते थे: तेरी कसम बाजरा। जी का जंजाल बाजरा। हाय पड़ोसन बाजरा। अल्लाह कसम बाजरा और पता नहीं क्या क्या!
अब तो सिर्फ इतना ही कहेंगे और बार-बार कहेंगे:
तवा कसम बाजरा! तवा कसम बाजरा!
खुर्शीद बानो के 1940 के दशक में बाजरे पर गाए गीत और उसी दशक में सुरिंदर कौर/प्रकाश कौर के गाए पंजाबी गीत बाजरे दा सिट्टा के बारे में अलग से चर्चा की जाएगी तवा संगीत में जल्दी ही। आखिर तवा संगीत और तवा भाजी दोनों बहनें ही तो हैं, जुड़वा बहनें!
कनकौए की सब्जी बनाना और बाजरे की रोटी बनाना एकदम अलग-अलग कार्य हैं। साग बनाने में क्या है!? तेल डाला, मसाले डाले, सब्जी डाली! सब तैयार!! हमारे समान आलसी और मंद बुद्धि भी बना डालते हैं।
लेकिन बाजरे की रोटी बनाने की हमारी औकात ही नहीं है। भिया लोग आपकी भी नहीं है। बेहतर होगा कि ये पुण्य कार्य देवी स्वरूप माताओं, बहनों, भोजियों,बीवियों या बहु-बेटियों पर छोड़ दें।
देवियां इन बाजरे की रोटी में न तो नमक डालती हैं न मिर्च। न तेल न मसाले। सिर्फ आग, पानी, हवा, तवा और उनका हाथ! हाथ से ही बेलकर ऐसा जादू कर देती हैं कि बाजरे की रोटी के साथ किसी सब्जी की भी जरूरत नहीं है। बस साथ में गुड की डली...
हमारे बचपन में बच्चे मोहल्ले की दादी अम्मा से पूछते थे: “दादी, आप हर बार बाजरे की रोटी ही क्यों बनाती हो?”
तो दादी कुछ ऐसा बोलती थीं: "जब तुम्हारे दादा और मैं नए-नए ब्याहे गए थे, तब गांव में बहुत अकाल पड़ा था। खेत सूख गए, कुएं सूख गए, लेकिन बाजरा और कनकौआ उगे रहे। हम बस बाजरे की रोटी को कनकौए के साथ खाते थे लेकिन लगता था जैसे राजा-महाराजा का भोजन खा रहे हैं। बाजरा सिर्फ पेट ही नहीं आत्मा को भी तृप्त कर देता है।”
बच्चे: “दादी… क्या दादा को भी ये रोटी पसंद थी?”
मोहल्ले की दादी नम आंखों और रुंधे गले से बोलतीं: “दादा तो कहते थे; जब तू ये रोटी सेंकती है, मुझे अपने बचपन की और मां की गोद याद आ जाती है।”
अब समझ में आता है कि संघर्ष की महक, भीगी मिट्टी का स्वाद, दादी की उंगलियों की गर्माहट, और चूल्हे पर बाजरे की रोटी सेंकने की कला स्त्रियों की पीढ़ियों से चली आ रही विरासत ही है। ये सिर्फ बाजरे की रोटियाँ नहीं हैं। इनमें आत्मीयता है, तपस्या है, अपार धीरज है। और हजारों अनकही कहानियों भी हैं!🙏
अब तक हम मर्द बस बाजरे की रोटी देखने, सराहने और खाने लायक ही बन पाए हैं। बाजरा गूंथने, बेलने और सेंकने लायक तो कतई नहीं। मातृ शक्ति के आगे कितने बौने हैं हम! उज्जैन वाली जिज्जी इस कुदरती कमी पर हमें नहीं डांट सकती हैं!🙏
ये सब पढ़कर उनका फोन बस आता ही होगा। भरे स्वर में केन लगेंगी:
"जिज्जी को रूला दिया .......! भोत डामिस है तू......!"
पंकज खन्ना
9424810575
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हिन्दी में:
तवा संगीत : ग्रामोफोन का संगीत और कुछ किस्सागोई।
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साइकल संगीत: साइकल पर आधारित हिंदी गाने।
ईक्षक इंदौरी: इंदौर के पर्यटक स्थल। (लेखन जारी है।)
अंग्रेजी में:
Love Thy Numbers : गणित में रुचि रखने वालों के लिए।
Epeolatry: अंग्रेजी भाषा में रुचि रखने वालों के लिए।
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Corruption in Oil Companies: HPCL के बारे में जहां 1984 से 2007 तक काम किया।
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