(4) नवरतन भाजी या सीता भाजी!?

पंकज खन्ना
9424810575

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पिछले दो लेखों के बाद प्रश्नों की बौछार झेल रहे हैं। पहले एक बड़े प्रश्न से निपट लें, फिर खेलेंगे भाजी-भाजी, तवाभाजी।

उज्जैन वाली जिज्जी की बातें पढ़कर  बहुत लोग पूछ रहे हैं ये 'डामिस' क्या होता है। आज पहले इसी प्रश्न के उत्तर  को समझ लेते हैं।

डामिस लगभग लुप्तप्राय शब्द है। बिल्कुल हमारी लुप्तप्राय सब्जियों के समान। सत्तर और अस्सी के दशक में मालवांचल में 'डामिस' शब्द काफी बोला जाता था। वैसे सभी पीढियों के लोग इसे प्रयोग में लाते थे। लेकिन रिटायर्ड दादाजी लोग ही इसे ज्यादा बोला करते थे।

हमारे बचपन वाले मोहल्ले के दादाजी एक अलग ही प्रजाति के होते थे। अक्सर घरों के ओटलों पर ग्रुप में पाए जाते थे। थोड़ा सा पोपला मुंह, सर पर टोपी, हाथ में छड़ी, मुंह में बीड़ी, खादी की पेंट, पेंट की  जेब में चूने और तंबाखू की दोमुंही डिब्बी, पैर में सैंडल या चप्पल, सर्वत्र आयोडेक्स की सुगंध, कभी-कभी गले में टाई भी।

स्कूटर नहीं बिस्कुटर, स्कूल नहीं बिस्कुल बोला करते थे। सब्जी नहीं, तरकारी बोलते थे। पालक नहीं सुआ-पालक खाते थे। नाना प्रकार की सब्जियों और उनके फायदों के बारे में बात करते थे। होटल तो कभी जाते  नहीं थे, एक दूसरे के घर बनने वाली तरकारियों के बारे में बातें करते थे। गैस का नहीं सिर्फ चूल्हे का खाना ही पसंद करते थे।

इन्हें दुनिया भर की चिंता लगी रहती थी। राजनीति पर बहस नहीं चर्चा करते थे। सबके अपने-अपने विचार होते थे। सिर्फ दो ही बातों पर इनकी पूर्ण सहमती बनती थी। पहली: जल्दी ही दुनिया  रसातल में चली जाएगी। दूसरी: 'आज कल के बच्चे भोत  डामिस होते हैं'!

हम  बच्चे भी एक दूसरे को डामिस कहा करते थे। ये शब्द गाली नहीं था, घरों में जो बोला जाता था। बड़ा बहुउद्देशीय याने मल्टीपरपस शब्द था। इसके कई मतलब हो सकते थे जैसे: नटखट, शैतान, बेईमान, धोखेबाज, चतुर, उद्दंड। दोस्त तो सभी डामिस ही होते थे।

अंग्रेजों के जमाने में जब अंग्रेज दुखी या गुस्सा होते थे तो अपने अधीनस्थ लोगों को बोलते थे : 'Damn it!' या 'Damn Beast!'। हमारे पूर्वजों को अंग्रेजों की नकल करने में बहुत मजा आता था तो वो भी अपने मातहतों को अंग्रेजों के अंदाज में बोलते थे: डामिस/डांबिस!

'Damn it!' बन गया था 'डामिस' और 'Damn Beast' बन गया था 'डांबिस'!

देसी पूर्वज अपनी बीवियों और अपने से छोटों को भी 'डामिस' या 'डांबिस' बोल कर डांटा करते थे। दोनों शब्दों का मतलब लगभग एक ही है। कालांतर में मालवा में सिर्फ डामिस रह गया। डामिस शब्द मालवी बोली में अच्छे से बैठ गया। और डांबिस शब्द मराठी में घुल मिल गया। आज भी महाराष्ट्र के पुराने लोग उनकी मराठी में डांबिस शब्द का कभी कभार उपयोग कर लेते हैं। 



उज्जैन वाली जिज्जी जैसे डामिस लोग ही इस शब्द को जिंदा रक्खे हैं! चलो बहुत हो गई डामिसगिरी! अब खाने पीने की, तवा भाजी की, बातें भी कर लें। 

आज  जानी पहचानी सब्जियों के पत्तों की भाजी के बारे में थोड़ा और जान लेते हैं। ये वो कॉमन सब्जियां हैं जिन्हें हम सभी बाजार से खरीद कर खाते हैं। लेकिन हम शहरी लोगों को इस बात का इल्म नहीं है कि इन सब्जियों के पत्तों की सब्जियां भी खाई जा सकती हैं।एक छोटी सी लिस्ट बनाई है जिसमें इन सब्जियों के हिंदी , अंग्रेजी और साइंटिफिक नाम नीचे लिखे हैं:

(1) कुंदरू ( टिंडोरी, टिंडोरा, Ivy Gourd, Coccinia grandis) के पत्तों की भाजी।

(2) लौकी (दूधी, घीया, Calabash, Lagenaria sicerari) के पत्तों की भाजी।

(3) बेंगन  ( Eggplant, Aubergine, Brinjal, Solanum melongena) के पत्तों की भाजी।

(4) कद्दू (कोहड़ा, कुंभडा, काशीफल, Pumpkin, Winter Squash, Cucurbita maxima) के पत्तों की भाजी।

(5) हरी मिर्च ( मिर्ची, कटुबिरा, रक्त मारीच , कुमारिच, Green chilli, Green Pepper, Capsicum annuum) के पत्तों की भाजी।

(6) परवल ( Pointed Gourd, Trichosanthes dioica) के पत्तों की भाजी।

(7) भिंडी ( Okra, Ladies Finger, Abelmoschus esculentus) के पत्तों की भाजी।

(8) गिलकी (Luffa cylindrica) के पत्तों की भाजी।

(9) तुरई ( Luffa aegyptiaca) के पत्तों की भाजी।

( इसके अलावा गोभी, पत्ता गोभी, गांठ गोभी, शलजम, चुकंदर, मूली जैसी सब्जियों के पत्तों की बातें सर्दीयों में करेंगे। )



अब सवाल ये उठता है कि ये सब्जियों के पत्ते कहां से लाएं? मंडियों में तो मिलने से रहे। आम किसान अपनी भिंडी/बैंगन/लौकी/कद्दू आदि की पूरी फसल खराब करके  पत्ते बेचने आपके शहर में तो नहीं आएगा। 

कुछ किसान शहर में मंडी में ना जाकर सीधे ये सब्जियां ग्राहकों को बेचते हैं। आप ऐसे किसी किसान भाई से निवेदन करें। वो आपके लायक पत्ते उचित दाम पर जरूर दे देंगे।

दूसरा तरीका ये  हो सकता हे कि आप घर में गमलों या क्यारियों में काफी मात्रा में ऊपर लिखी सब्जियां उगा लें। थोड़ी सी समझदारी और सावधानी से आप सब्जियों और पत्तों दोनों का उपयोग कर सकेंगे।

कर्म करो, फल की चिंता मत करो। पत्तियां काट लो

इतनी सी बात है जो जिज्जू को जल्दी ही समझ आ गई है! सुबह से घर के आंगन में आतंक मचा रखा है।  उज्जैन वाली जिज्जी के बगीचे में उगी सारी सब्जियों का सत्यानाश पीट रखा है। ईंटों का चूल्हा बना दिया है। नीचे लकड़ी जल रही है और ऊपर  घर में जिज्जी का दिल! 

सारी सब्जियों के पौधों के पत्ते तोड़ डाले है। सभी पौधे गंजे हो गए हैं उनके समान। खुद तो अंग्रेजों के जमाने की टोपी पहन चुके हैं मगर सब्जियों के पोधों को भूत बंगला बना छोड़ा है। सोचिए बैंगन का पौधा कैसा दिखेगा जब सारे पत्ते नोच दिए गए हों और सिर्फ छह बैंगन लटके पड़े हों! पता नहीं क्या पी के बैठे हैं, उन्हें जिज्जी दिख ही नहीं रही हैं!  इतनी हिम्मत!! कहने का मतलब ये, कि क्या रिस्क रे बाबा, क्या रिस्क रे बाबा!


दो हाथ में दो पलटे, और गा रहे हैं पोई, पोई!। प्यारी सी मुस्कुराहट के साथ, एक-एक करके सभी नौ प्रकार के पत्तों को अलग-अलग Stir Fry करने के बाद सबको मिला कर लस्सन और हरी मिर्च का तड़का सरसों के तेल में लगा चुके हैं। आप चाहें तो इसे नवरतन भाजी नाम दे दें। मक्के की रोटी भी बना रखी है। मात्र 6 घंटे और 23 मिनट में उन्होंने ये सब तैयार कर लिया है!

थोड़ा सा होश अभी बाकी है। इन्होंने भोला गुरु से पहले ही जिज्जी के पसंद की आलू की सब्जी, मेथी दाने की सब्जी, ढेर सारी पूरीयां और मक्खनबड़े मंगा रखे हैं। 

जिज्जी हर साल दिवाली के बाद के अन्नकूट में सभी टाइप की सब्जियां मिलाकर मालवी स्टाइल में बहुत  स्वादिष्ट राम भाजी बनाती हैं, जिज्जू के लिए। अब जिज्जू ने अपनी बनाई डिश का नाम रख दिया है सीता भाजी, जिज्जी के लिए! कह रहे थे कि अशोक वाटिका में माँ सीता ऐसे ही पेड़, पौधों, लताओं और बेलों के बीच रही थीं। इस डिश का नाम तो सीता भाजी ही रहेगा। 

अब जिज्जू जिज्जी से निवेदन कर रहे हैं : "लो खा लो मैडम खाना!" 


खाने को देखने के बाद ही  जिज्जी ने इस भाजी का नाम क्या रख दिया होगा आप सब जानते हैं!  उन दोनों के बीच में और क्या प्यार भरी बातें हुई होंगी, जानने के लिए ये गाना देख लीजिए: लो खा लो मैडम खाना

(ये गाना फिल्म स्ट्रीट सिंगर (1938) का है। इसे गाया है खेमचंद प्रकाश और रेखा नाम की किसी गायिका ने। पर्दे पर भी ये दोनों ही हैं। खेमचंद प्रकाश ने इसमें थोड़ा सा कथक नृत्य भी किया है । गीत लिखा है आरजू लखनवी ने। और संगीतकार हैं आर सी बोराल। खेमचंद प्रकाश बाद में एक नामी संगीतकार बने। उन्होंने ही फिल्म महल (1949) में लता से आएगा आएगा आनेवाला गवाकर तहलका मचा दिया था।)


लो खा लो मैडम खाना गाने के बोल ये हैं:

लो खा लो मैडम खाना
लो खा लो मैडम खाना
खा लो मैडम खाना।

क्यों इतनी देर लगाई
है जान लबों पर आई
और पेट में उड़ गई धूल
मुये चन्डूल गधे की ज़ूल
और पेट में उड़ गई धूल
मुये चन्डूल गधे की ज़ूल।

मैं लेने गया था मिठाई
रस्ते में ठोकर खाई
मैं लेने गया था मिठाई
रस्ते में ठोकर खाई
और चोट देखो आई
और चोट देखो आई।

चल झूठे मुये हरज़ाई
ये सब बक बक है फ़िज़ूल
चल झूठे मुये हरज़ाई
ये सब बक बक है फ़िज़ूल
मुये मजूल नामाकूल।

क्यों इतनी हो झल्लाती
ये सालन है ये चपाती
क्यों इतनी हो झल्लाती
ये सालन है ये चपाती।

मुझको तो नहीं है भाती
हाँ पूरी कचौरी खाती
हाँ पूरी कचौरी खाती
मुझको तो नहीं है भाती
हाँ पूरी कचौरी खाती
हाँ पूरी कचौरी खाती।

फिर जाऊँ अभी फिर जाऊँ
तुम ठहरो अभी ले आऊँ।

क्या भूख से मैं मर जाऊँ
या कच्चा तुझे चबाऊँ
नामाकूल गधे की ज़ूल
मुये चन्डूल।

अब देर ना होगी बख्शो
तुम बख्शो हाँ बख्शो
अब देर ना होगी बख्शो
तुम बख्शो हाँ बख्शो।

क्या छोड़ दूँ यूंहीं तुझको
छोड़ दूँ यूंहीं तुझको
क्या छोड़ दूँ यूंहीं तुझको
छोड़ दूँ यूंहीं तुझको।

बस तौबा बीबी तौबा
पहले भी की थी तौबा
अरे बस तौबा बीबी तौबा।

पहले भी की थी तौबा तौबा
ऊलजलूल बिलाडी फूल।

सन 1938 में एक गाने में इतनी गालियां एक महिला द्वारा पुरुष को!? आपने शायद पहले किसी गाने में नहीं सुनी होंगी। 

क्यों इतनी सारी गालियां बकना रे? सिर्फ एक शब्द से काम चला लो ना, डामिस!



पंकज खन्ना
9424810575


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