(3) गुडरी की भाजी, राजा का भोज!

पंकज खन्ना
9424810575



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आप फिर आ गए! मतलब पोई  पसंद आई! धन्यवाद! स्वागतम!!😊💐🙏

पूरा विश्वास था कि मेरे करण-अर्जुन (चटोरे-चटोरी) आयेंगे। जरूर आयेंगे! पोई के बाद गुडरी का साग भी खाएंगे! हमारे समान मरभुक्खे जो हैं! 

तो फिर आज अच्छे से बनाते हैं गुडरी का साग आप जैसे गुदड़ी के लालों और लालियों  के लिए!

गुदड़ी के लाल का मतलब होता है: साधारण गरीब घर में जन्मा गुणवान व्यक्ति। गुडरी की भाजी भी ऐसे ही  दिखने में साधारण, पर गुणों से भरपूर होती है। दरअसल, गुडरी की भाजी ही गुदड़ी का लाल है। और देखिए, गुडरी और गुदड़ी दोनों की स्पेलिंग भी एक ही है: Gudri! 

और एक अंदर की बात बताऊं!? इस औषधि संपन्न सब्जी गुडरी को मंगलवार को मंतर (मंत्र) मारकर  खाने से पति या पत्नी का वशीकरण भी किया जा सकता है! 

(दशकों पहले  मोहल्ले के घड़ीसाज मुक्का मामू ने  मावस की एक रात  मोमबत्ती की मद्धिम रोशनी में, महूए की मदहोशी में, ये महती माहिती मोहल्ले के कुंआरे छोरों को दी थी।)

वशीकरण के नाम पे कैसे आपकी आंखों का 'बहशीकरण' हो गया है! बांछे खिल गई हैं! भिया की आँखें बिजली का 'गुलुप' बन कर बाहर लटक-लटक गई हैं! बीबी बच्चों को भूलकर ये कम्मो की याद में शर्माए जा रहे हैं, गिरे पड़े जा रहे हैं! और जिज्जी की आंखों से तो दिन दहाड़े सोनम झांक रही है! 

अरे पहले सब्जी के बारे में तो जान लें! फिर समझते रहेंगे वशीकरण!



सुनो छोटी सी गुडरी की लंबी कहानी:)

गुडरी (Alternanthera sessilis) एक छोटे-छोटे सफेद फूलों वाला पौधा है जिसे Sissoo Spinach, Brazilian Spinach, Sessil Joyweed, Dwarf Copperleaf और छाजन बूटी आदि नामों से जाना जाता है। इसे दक्षिण भारत में पोन्नंगन्नी कीराई ( Ponnanganni Keerai) कहते हैं। 

इसके फूलों की तुलना मछली की आंखों से की गई है तो इसे मस्त्याक्षी या मीनाक्षी नाम से भी जाना जाता है।इसके पूर्ण रूप से खिले फूलों से मछली की दुर्गंध आती है इसलिए संस्कृत में इसे मत्स्यगंधा  नाम भी दिया गया है। और  यही कारण है कि इसके पत्तों को फूल आने के पहले ही तोड़ लिया जाता है। 

ये एक बारहमासी जड़ी बूटी है जिसके तने फैले होते हैं। इनके नोड्स पर भी जड़ें होती हैं इससे ये जमीन पर ही फैलते  जाते हैं। अधिक  ऊपर नहीं जाते हैं।

यह पौधा जंगली रूप में उगता है। बड़ा ढीठ पौधा है। जंगल, गांव, शहर में कहीं भी उग जाता है। खेत में, खलिहान में, खेतों की मेढ़ पर, सड़कों में, गलियों में, पेवर ब्लॉक और सड़क के बीच के हिस्से में, घरों के दाएं -बाएं, आगे-पीछे कहीं भी। उखाड़ के फेंक दो, थोड़े दिनों बाद फिर उग जाएगा। 

(मोहल्ले के घड़ीसाज मुक्का मामू , अव्वल दर्जे के औघड़ बाबा, हर होली और दिवाली को ही स्नान करते हैं। होली और दिवाली के बीच की अवधि में इनकी बगल में भी गुडरी का पौधा उग जाता है, समय पर फूल भी आ जाते हैं! दूसरों को भले हो, ये कभी शिकायत नहीं करते। कहते हैं कि चलो अच्छा है छांव हो गई! )

उधर किसान भाई गुडरी से काफी परेशान रहते हैं। खेत में फैलती ही जाती है। बेचारे कितनी खाएंगे! अगर ये सूख जाए तो इसे निकालना और मुश्किल हो जाता है।

आपको कभी शहर में गुडरी न मिले तो पास के किसी भी गांव के किसी भी किसान से मिल लें। आपको प्यार से चाय नाश्ता कराएगा और बोरे/कट्टे भर-भर के गुडरी यूं हीं दे देगा।

इसके पत्ते कुरकुरे (Crispy) होते हैं पालक की तुलना में थोड़े ज़्यादा। और ये पोई  के समान स्टार्ची भी नहीं होते हैं। यह आयरन, कैल्शियम, फॉस्फोरस, प्रोटीन और विटामिन ए, सी और बी से भरपूर सब्जी है। ये पेट को साफ करने वाली और मूत्रकारक (Diuratic) होती है।  मधुमेह के रोगियो के लिए भी अच्छी मानी जाती है। इसके अलावा इसे खाने से नेत्र की ज्योति तेज होती है। संक्षेप में, आप तो सिर्फ ये जानें कि इसमें काफी मात्रा में पोषक तत्व होते हैं। ये स्वाद और स्वास्थ्य दोनों में अमूल्य है।

वो तो ये भी कहते हैं इसे खाने से बालों का गिरना रुक जाता है! ही! ही! ही!! ये थोड़ा ज्यादा हो गया!

एक प्रकार से, गुडरी जीवन की सच्चाई का प्रतीक भी है। सदियों से  बिना किसी दिखावे के चुपचाप गांव वासियों को  पोषण देती आ रही है। लेकिन इसे कोई भाव नहीं देता है। मण्डी भी नहीं। जैसे कोई साधारण व्यक्ति समाज को बड़े-बड़े योगदान दे जाता है, लेकिन कोई कद्र नहीं होती। वैसे ही गुडरी की भाजी भी है एक गुमनाम नायक, Unsung Hero.

गुडरी और  गुडरी जैसी अन्य वन्य भाजियों को फणीश्वर नाथ रेणु, शिवानी और शैलेश मटियानी जैसे लेखकों ने अपनी कहानियों में जरूर काफी महत्व दिया है।🙏

आज भी ये शहरों में बची हुई खाली जमीनों पर आसानी से उग जाती है पर रौंद दी जाती है या उखाड़ दी जाती है। 'धरती मेरी माँ है, धरती मेरी माँ है' का राग अलापते हैं और हमारी ही धरती पर उगे फल और सब्जी खाने से परहेज करते हैं। पराई धरती पर उगे फल और फिरंगी, विलायती सब्जियां बहुत महंगे खरीदकर शौक से खाते हैं। 

सब मार्केटिंग का पैंतरा है बावा! अगर हॉलीवुड/ बॉलीवुड के महंगे फिल्मी हीरो-हीरोइन  किसी बड़ी  कंपनी के विज्ञापन में इसे 'सुपरफूड' बता दें तो इस गुडरी के दिन भी फिर जाएंगे! फिर हम वॉट्सएप पर सतत लिखा पाएंगे कि हमारे ऋषि मुनि इसे ही  खाकर इतने विद्वान बने थे। 

गुडरी की भाजी  ऐसे समय की याद दिलाती है जब लोग जंगलों, खेतों और प्रकृति से सीधे भोजन प्राप्त करते थे। यह एक आत्मनिर्भर जीवन शैली थी, जहां बाज़ार पर निर्भरता बहुत कम थी। महिलाएँ  जंगलों या खेतों से गुडरी जैसी साग लाकर स्वादिष्ट व्यंजन बनाती थीं।

दादी अम्मा पोता-पोतियों को बोलती थीं: "गुडरी तोड़ी ले आ रे बेटा, आज कुछ सादी सब्ज़ी बना दूं।" पर जब वो इसे सरसों के तेल में हरी मिर्च और लस्सन  का बघार लगा कर चूल्हे की रोटी के साथ परोसती थीं तो गांव में गदर मच जाता था।

राजा, रईस, नेतागण, और प्रभावशाली लोगों को भी  ऐसी साधारण भाजियां जीमने में आनंद आता रहा है। क्योंकि वो अच्छे से जानते हैं कि साधारण समझी जाने वाली भाजी भी स्वाद और स्वास्थ्य में अत्यंत समृद्ध हो सकती है। इसी संदर्भ में एक पुरानी ग्रामीण कहावत है: "गुडरी की भाजी, राजा का भोज"। 

मतलब, प्रतिदिन  सूखे मेवे और महंगे फल, सब्जियां आदि खाने वाले राजाओं  के लिए गुडरी की भाजी ही एक विशिष्ट भोज है।

इंदौर में एक Saturday Supper Club है। ध्यान रहे नाम Supper Club है Super Club नहीं! बस सुना ही है कभी गए नहीं। ये ऐसी सब्जियों को परोसते हैं नए नए फ्लेवर में, गांवठी या जंगली स्टाइल में। अंत में महूए की मिठाई भी खिलाते हैं। वो कहते हैं Forest Food Experts इसे बनाते हैं। इस डिनर की कीमत होती है पूरे 1500 रुपए!

कबसे के रिया हूं भिया, गुडरी की भाजी राजाओं का ही भोज है! 

गुडरी में काफी औषधीय गुण होते हैं इसलिए  इसके अत्यधिक और निरंतर सेवन से बचना चाहिए।  कहने का मतलब ये है कि बार-बार गुडरी का साग लेने के लिए कटोरा आगे-आगे नहीं बढ़ाना है, पेटूओं और पेटीओं !

अगर आप किसी Botanist, Scientist  या जानकार कृषक ग्रामीणों से पूछेंगे तो वो आपको बताएंगे कि आप इसको खा सकते हैं। लेकिन आपने कभी किसी शहरी माली बाबा से पूछा तो उनका जवाब होगा: "नहीं खाते हैं इसे। गाय ढोर भी नहीं खाते इसे"! 

सही पढ़ा आपने। ढोर नहीं खाते हैं इसे!

गुडरी की भाजी पर कुछ लिखना उसी प्रकार है जैसे आम इंसान की कहानी लिखना। किसे फुरसत है आम आदमी की कहानी पढ़ने में या गुडरी की भाजी समझने में!? 

गुडरी की सादगी और स्वाद दोनों ही हमें यह सिखाते हैं कि असली जीवन वही है जो दिखावे से दूर, मिट्टी से जुड़ा हो। साधारणता में ही सुंदरता छिपी है। लेकिन चमक दमक की इस दुनिया में इतनी आसानी से दिखाई नहीं देती है।

एक बहुत ही सारगर्भित कहावत है जो सीधे-सादे स्वाभिमानी ग्रामीण पृष्ठभूमि के लोग अक्सर उपयोग में लाते हैं:  "गुडरी का साग खाकर गुजारा कर लेंगे पर किसी के आगे हाथ नहीं फैलाएंगे"।🙏🙏

अंत में ये ख्याल रहे कि देश की अलग-अलग  सभ्यताओं में इन वन्य भाजियों के नाम अलग-अलग हो सकते हैं। कुछ लोग पोई को और अन्य वन्य भाजियों को भी गुडरी बोल देते हैं। इसका उल्टा भी हो  सकता है।जरा भी कन्फ्यूजन हो तो साइंटिफिक नाम याद रखें: Alternanthera sessilis. ये भी याद रखें कि गुडरी के  तीन टाइप होते हैं। पहली टाइप जिसकी फोटो ऊपर लगा रखी है और जो बनाई जा रही है। दूसरी टाइप के पत्ते थोड़े लंबे होते हैं। और तीसरी टाइप में पत्ते लाल और लंबे होते हैं। 

अब कुकिंग पर आ जाते हैं। वशीकरण की बात सब्जियां बनने के बाद! 

जिस दिन पोई का आर्टिकल पढ़ा, उद्दीन (उस दिन) उज्जैन वाली जिज्जी का फोन आ गया। मालवी हिंदी में केन लगीं: "क्यों रे डामिस ज्यादा तेज़ चल रिया ए क्या!? छह-छह डिस बनवा रिया है! तेरी लुगई से ही बनवा ले! और सुन, कित्ती भी डिस बना ले तू, सुबह-सुबह एक ही निकलनी है। तेरे जिज्जा जी को तो एक डिस निकालने में ही ढई घंटे लग जाते हैं। छह डीस  खिलाएं तो दिन भर वहीं बैठे रहेंगे। डामिस!" हमारा उत्तर ही नहीं सुना। फोन पटक दिया! 

ऐसे फीडबैक के बाद आज बस तीन  डिश ही बनाएंगे। एक उत्तर भारतीय  स्टाइल में और दो दक्षिण भारतीय स्टाइल में। सूप, रायता, पकोड़े और सलाद बनाना या नहीं बनाना आपकी मर्जी। वैसे अगर आप चुपके से ये आइटम भी बनाना चाहते हैं तो विधि तो वो ही रहेगी पोई वाली। पोई पर क्लिक करो और खुद जान जाओ।

कुकिंग के शुरू करने से पहले वॉर्म अप एक्सरसाइज कर ली जाए! सर्वप्रथम संगीतवाला तवा ले लेते हैं। उस पर लगा दिया है फिल्म अलबेला (1951) के LP का यह गीत: किस्मत की हवा कभी नरम कभी गरम। संगीतकार और गायक हैं सी रामचंद्र। 

आप इसी गाने को यूट्यूब पर बारीकी से देख लीजिए।  लिंक ऊपर लगा ही दिया है। गाना फिल्माया गया है भगवान दादा और गीता बाली पर। ये भगवान तो डांस के भगवान हैं। ये एक उम्दा  किचन गीत और  डांस गीत है। इसमें पुराने जमाने की रसोई दिखाई गई है। भगवान नाचते और गाते हुए बर्तनों को संगीत के उपकरणों के समान उपयोग में ला रहे हैं। आज खाना बनाने के दौरान इसे  ही गाना है और ऐसे ही नाचना है, भगवान स्टाइल में। अच्छे से देख लीजिए!

एक  तवे पर गाना बज रहा है और दूसरे तवे पर खाना बनेगा। तवे का गाना और तवे का खाना! वाह क्या जुगलबंदी है! 

काली नजर न लग जाए इसलिए दोनों तवों के ऊपर नींबू मिर्ची टांग दी है;) अब शुरू करते हैं रसोई की तैयारी!

गुडरी : उत्तर भारतीय स्टाइल 

मेथी, सरसों, कुल्फ़ा, सुआ, अमाड़ी जैसी  कुछ सब्जियों को छोड़कर लगभग सभी पत्तेदार सब्जियों का स्वाद थोड़ा मृदु (Mild) होता है। गुडरी के पत्तों का स्वाद भी मृदु ही होता है। अगर इसके पत्ते थोड़े बड़े हो जाने यानी फूल आने के बाद तोड़ेंगे तो हल्का सा कड़वापन आ सकता है।

ऐसी मृदु पत्तेदार सब्जियों को बनाने के लिए पारंपरिक रूप से प्याज, लस्सन, अदरक, हरी मिर्च आदि को तेल या घी में भूनकर पत्तेदार सब्जी बनाई जाती है। 

लेकिन इन्हीं चार पांच अवयवों  से आप अथाह विभिन्नता उत्पन्न कर सकते हैं। बस थोड़ा सा सोच विचार करके।

कभी कुछ इंग्रेडिएंट्स को पीस लें और कुछ को बारीक काट लें। कभी सब्जियों को छोटा काट लें , कभी मोटा।कभी ये तेल ले लें कभी वो तेल ले लें। कभी  गरम मसाला डाल दें कभी ठंडा मसाला डाल दें। कभी टमाटर डाल लें कभी अमचूर डाल लें। कभी बगैर मसाले के भी बना कर देखें। कभी आलू डाल दें, कभी मूंगफली, कभी तिल। कभी दिल भी डाल कर देखें!

कभी चूल्हे पर बना लें, कूल्हे मटकाते हुए। और कभी गैस पर  बना लीजिए, गैस करते हुए। यहां हमारा तात्पर्य Guess शब्द से था। आपके  भ्रष्ट दिमाग में तो बस भ्रष्ट बातें ही भरी हुई हैं!

चूल्हे पर बनाएंगे तो बहुत फायदे हैं। असली देसी धुएंदार स्वाद आएगा । चूल्हे में शोले भड़केंगे, फिर दिल तो धड़केंगे ही। घर में चूल्हे की व्यवस्था नहीं है तो और एक विकल्प है कि किसी ग्रुप के साथ  जंगल में जाएं और जंगल चूल्हा बनाएं कुछ इस तरह:

मिट्टी की हांडी में सरसों के तेल में अपने हिसाब से सभी इंग्रेडिएंट्स डालकर बनने दें गुडरी का साग। मिट्टी की हांडी न मिले तो धातु की हांडी ले लें और इसमें सब्जी के साथ दिवाली वाले कुछ नए दियों के चार-चार टुकड़े करके डाल दें। सब्जी में मिट्टी की सौंधी-सौंधी खुशबू मिलेगी। (मार्केटिंग वाले इसे परोसकर नाम दे देंगे: 'Petrichor in Plate' और कीमत रख देंगे Rs.850.)

अब थोड़ा और नाच-गाना कर लें गुडरी को ढंग से पकाने के लिए! फिर से पिक्चर, हीरो, हीरोइन और संगीतकार भी वही हैं लेकिन ये गाना एक लेवल ऊपर का है: शोला जो भड़के, दिल मेरा धड़के! गजब  गाया है चितलकर (सी रामचंद्र) और लता मंगेशकर ने। और  पर्दे पर फिर से गजब ढाया है भगवान और गीता बाली ने।

इस गाने में भी जंगली चूल्हे में हांडी पर कुछ बन रहा है। एक तरफ हांडी के नीचे शोले भड़क रहे हैं, दूसरी तरफ लोगों के दिल धड़क रहे हैं। सनन नाच गाना चल रहा है। भगवान की स्टाइल और गीता बाली के लटके-झटके देखें और डांस करें!

इतने परफेक्ट लिखे, संगीतबद्ध किए, गाए और पर्दे पर फिल्माए  गाने बहुत ही कम मिलेंगे। परफेक्ट गाने के साथ परफेक्ट भाजी भी तैयार है। 

बाजरे/जौ/ज्वार/रागी/मक्के या गेहूं की रोटियां आपकी आवश्यकतानुसार बना लें। 

सनद रहे पढ़े लिखे शहरी गंवारों, दिये के टुकड़ों को सब्जी में से निकाल फेंकने के पहले अच्छी तरह से चाटना है! 

अरे इतना भी क्या चाटना! अपने तो दिए के टुकड़े की मिट्टी ही पलीत कर दी! सच में भोत बड़े वाले खाऊ हो भिया यार!

गुडरी:  दक्षिण भारतीय स्टाइल

पहली डिश: सबसे पहले तुअर की दाल को घी में थोड़े से गुडरी के पत्ते मिला कर बना लें। आपके विवेक से सांभर मसाला, रसम मसाला या अन्य कोई  पोडी ( दक्षिण भारतीय मसाले जैसे Gun Powder आदि) दाल में डाल दें। साथ में लाल मोटा चावल या उसना (सेला, Parboiled) चावल बना लें! जिंदगी संवर जाएगी!

दूसरी डिश: तवे पर या कढ़ाई में तेल गरम करें। नारियल का हो तो अति उत्तम। दो बड़े चम्मच भीगी हुई उड़द की दाल और  कढ़ी पत्ता डाल कर अच्छे से भून लें। फिर गुडरी के एकदम बारीक कटे हुए पत्ते डाल दें। इनको लगातार हिलाते रहें। अब आपकी इच्छानुसार इसमें कसा हुआ नारियल भी डाल दें। सब्जी बिल्कुल कुरकुरी बनना चाहिए।  अगर तवे पर इसे बनाने में मुश्किल आ रही है तो आप पत्तों और अन्य सामग्री को तल भी सकते हैं। बाकी नमक मिर्च और अन्य मसाले!? जैसी जजमान की इच्छा।

अब इस  कुरकुरी सब्जी पर पनीर या चीज़ को कस कर डाल दें और उनकी तरफ कनखियों से देखते हुए प्यार से, बहुत प्यार से, मस्ती में गाएं: तू चीज़ बड़ी है मस्त-मस्त या तू चीज़ बड़ा है मस्त-मस्त! आप तो अमूल चीज़ के लिए गा रहे हैं, शरम कैसी!! यहीं हो जाएगा वशीकरण!

(रहा सवाल घड़ीसाज मुक्का मामू का तो बता दें कि पहले ये  मुक्का मारकर घड़ियों की मरम्मत करते थे।साथ ही साथ वशीकरण टाइप के तंत्र मंत्र भी करते थे। लेकिन मामी कभी उनके वश में नहीं थीं! उनको 40-45 साल पहले ही  छोड़कर जा चुकी हैं, मुक्के मार मार के! अब काफी बुजुर्ग हो गए हैं। चाबी वाली घड़ियों का काम तो बचा नहीं है इसलिए अब 'घड़ासाज' हो गए हैं। इंसान के कांधे पर रखे भूतिया घड़ों की मरम्मत करते हैं मसान अड्डे में मुक्का मारके! अपॉइंटमेंट चाहिए!?

साथ ही साथ पार्ट टाइम में  'उनकी खुद की उगाई गुडरी की भाजी' आपको खिलाकर,  फोटो पर मंतर मारकर, आपके पति या पत्नी का वशीकरण भी करते हैं! बोलो करवाना है!?)

भिया और जिज्जी होन,  ये तंत्र-मंत्र, वशीकरण-वशीकरण कुछ नहीं होता है। प्यार से गुडरी बनाने से, उनको खिलाने से और अच्छे गाने सुनाने से यूं ही वशीकरण हो जाएगा! एक बार कोशिश तो करिए! 



पंकज खन्ना
9424810575


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हिन्दी में:

तवा संगीत : ग्रामोफोन का संगीत और कुछ किस्सागोई।
रेल संगीत: रेल और रेल पर बने हिंदी गानों के बारे में।
साइकल संगीत: साइकल पर आधारित हिंदी गाने।
ईक्षक इंदौरी: इंदौर के पर्यटक स्थल। (लेखन जारी है।)

अंग्रेजी में:

Love Thy Numbers : गणित में रुचि रखने वालों के लिए।
Epeolatry: अंग्रेजी भाषा में रुचि रखने वालों के लिए।
CAT-a-LOG: CAT-IIM कोचिंग।छात्र और पालक सभी पढ़ें।
Corruption in Oil Companies: HPCL के बारे में जहां 1984 से 2007 तक काम किया।



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